तेल की बढती हुई कीमतों पर अपनी राय दीजिये और आंकलन के लिए ये लेख जरुर पढ़ें

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अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ​तेल की कीमतें कम होने के बाद भी जनता को इसका लाभ न मिलना तर्कसंगत नहीं है। इससे तो उलटे महंगाई की मार जनता पर पड़ती है। अधिकांश माल ढुलाई का काम तो तेल से चलने वाले वाहनों से ही होता है। इसलिए जनता की इस समस्या पर सरकार को पूरी पारदर्शिता से ही पेश आने की जरूरत है। बढ़ते कर और कीमतों के बोझ को विकास की बड़ी राहत से ही तोलना सर्वहित में है, जो दिखाई भी नहीं दे रहा है।

पेट्रोल-डीजल की कीमतें मौजूदा समय में अपनी रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं। कहा जा रहा है कि कीमतें अभी और बढ़ सकती हैं। एक दिलचस्प बात यह है कि जो देश भारत से तेल खरीदते हैं, वे हमसे सस्ती कीमत में इसे बेचते हैं। देखते हैं कि पेट्रोल के दाम आसमान क्यों छू रहे हैं और कैसे तय होती है इनकी कीमत :

सबसे पहले हम जानते है भारत के पड़ोसी देशों में क्या है तेल की कीमत जिनकी हमारे देश के आगे कोई बिसात भी नही है …

तो इसलिए तेल में लग रही आग

कच्चे तेल की कीमत और पेट्रोल-डीजल की बढती मांग इसकी मुख्य वजह है। कच्चे तेल की कीमत हालांकि अभी 70 डॉलर प्रति बैरल है। याद होगा कि 2013-14 में यह रेट 107 डॉलर प्रति बैरल तक पहंच गया था। उस वक्त जब कीमतें सरकारी नियंत्रण से मुक्त हो गईं तो इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा। हालांकि इंडियन बास्केट के कच्चे तेल की कीमत घटी, लेकिन कई तरह के टैक्स की वजह से देश में पेट्रोल-डीजल महंगा होता चला जा रहा है।

तो जानिए कैसे तय होते हैं दाम

सबसे पहले खाड़ी या दूसरे देशों से तेल खरीदते हैं, फिर उसमें ट्रांसपोर्ट खर्च जोड़ते हैं। क्रूड आयल यानी कच्चे तेल को रिफाइन करने का व्यय भी जोड़ते हैं। केंद्र की एक्साइज ड्यूटी और डीलर का कमीशन जुड़ता है। राज्य वैट लगाते हैं और इस तरह आम ग्राहक के लिए कीमत तय होती है।

पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी में 105. 49 फीसदी और डीजल में 240 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। दरअसल, फिलहाल पेट्रोल डीजल में कई सारे टैक्स शामिल हैं। मसलन, एक्साइज ड्यूटी और वैट (मूल्य संवर्धित कर)। इसके अलावा डीलर की ओर से लगाया गया रेट और कमीशन भी कीमतों में जुड़ते हैं। एक्साइज ड्यूटी तो केंद्र सरकार लेती है, जबकि वैट राज्यों की आमदनी (राजस्व) में जुड़ता है।

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