अमेरिका ने पूरी दुनिया के लिए बढ़ा दिया खतरा, चुनौतियों के लिए रहना होगा तैयार

वर्तमान विश्व में विविध प्रकृति वाले वृद्धिमान खतरों को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि ईरान के साथ परमाणु समझौते से अमेरिका का बाहर होना या एक प्रकार से इस समझौते को एकतरफा तोड़ देना इन खतरों को और गंभीर बना रहा है। यह विश्व समुदाय के समक्ष न केवल नई चुनौतियां उत्पन्न करेगा, बल्कि नियम-आधारित विश्व व्यवस्था और बहुपक्षीय कूटनीति की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह भी लगाएगा।

ध्यातव्य हो कि 2015 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थाई सदस्यों, जर्मनी तथा यूरोपीय संघ के बीच ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर एक दीर्घकालिक समझौता किया गया था। संयुक्त समग्र कार्ययोजना नामक इस समझौते के तहत ईरान ने अपने संवेदनशील परमाणु संस्थापनों को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष निगरानी के लिए सहमति दे दी।

इसके बदले ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध हटा लिए गए थे। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने लगातार यह सूचना दी कि ईरान समझौते के अनुरूप नियमों का पालन कर रहा है। ऐसी स्थिति में अमेरिका द्वारा समझौते से एकपक्षीय विलगाव ने परमाणु सुरक्षा के लिए अब तक किए गए प्रयासों को औचित्यहीन बना दिया है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का यह मानना रहा है कि उनके सत्ता में आने के बाद से ही यह महसूस किया गया था कि ईरान का यह समझौता व्यावहारिक नहीं है और इसे बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है। दूसरी ओर इस समझौते में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिससे उसके गोपनीय परमाणु कार्यक्रमों पर निगरानी राखी जा सके। वस्तुत: राष्ट्रपति ट्रंप की विदेश नीति में ईरान आरंभ से ही एक ऐसा राष्ट्र माना गया था जो अपने परमाणु कार्यक्रम के कारण विश्व के समक्ष खतरे उत्पन्न करता है।

परमाणु हथियारों के प्रति संवेदनशीलता

अमेरिका द्वारा इस समझौते से बाहर आने का कारण कदाचित उसका परमाणु हथियारों के प्रति संवेदनशीलता कम है और यह ईरान के प्रति उसकी कटुतापूर्ण नीति का प्रतीक है। यह भी माना जा सकता है कि मध्य पूर्व में अमेरिका के कई बड़े मित्र राष्ट्र जैसे सऊदी अरब तथा इजरायल आदि भी ईरान के पक्ष में नहीं रहे हैं और अमेरिका ने इनके हितों को भी ध्यान में रख कर शायद ऐसा निर्णय लिया है।

ईरान के प्रति इन राष्ट्रों का नकारात्मक दृष्टिकोण अमेरिका के समझौते से बाहर होने के बाद मध्य पूर्व में अस्थिरता का वातावरण बनाने का कार्य कर सकता है। 2015 में वियना में ईरान तथा पी51, जर्मनी और यूरोपीय संघ के बीच किए गए समझौते में यह प्रावधान किया गया कि संवर्धित यूरेनियम का उपयोग केवल ऊर्जा उत्पादन के लिए होगा न कि शस्त्रों के निर्माण में।

ईरान में यूरेनियम संवर्धन

ईरान में यूरेनियम संवर्धन के दो स्थान हैं- नतांज एवं फोदरे जहां यूरेनियम हेक्सा फ्लोराइड गैस का प्रयोग अपकेंद्रण की प्रक्रिया में किया जाता है। जुलाई 2015 में इस समझौते के तहत यह प्रावधान किया गया कि 2031 तक ईरान अपने यूरेनियम भंडार में 98 प्रतिशत की कमी कर उसकी मात्र 300 किलोग्राम तक सीमित करेगा। उल्लेखनीय है कि जनवरी 2016 तक ईरान ने नतांज तथा फोदरे में स्थापित अपकेंद्रण संयंत्रों की संख्या में अप्रत्याशित कमी कर दी थी।

समझौते के समय तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा ने यह विश्वास व्यक्त किया था कि यह समझौता ईरान को गोपनीय रूप में परमाणु कार्यक्रम के संचालन से रोकने में सफल होगा। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी द्वारा निगरानी किए जाने पर सहमति व्यक्त करने के साथ ईरान ने एजेंसी के एक अतिरिक्त प्रोटोकॉल पर भी हस्ताक्षर किए थे।

ईरान पर प्रतिबंध

जहां तक भारत का प्रश्न है। हालांकि भारत सतर्कतापूर्ण तरीके से इस घटना का अध्ययन कर रहा है, लेकिन अमेरिका द्वारा ईरान पर दोबारा प्रतिबंध लगाए जाने की स्थिति में भारत-ईरान व्यापारिक संबंधों को आघात लगेगा। ऐसी स्थिति में भारत को अपनी ‘लिंक वेस्ट’ नीति को और प्रभावी तथा विषय-विशिष्ट बनाना होगा।

जिस प्रकार के प्रभाव भारत पर पड़ने की आशंका है उनमें तेल की कीमतें सबसे महत्वपूर्ण हैं। ईरान इराक और सऊदी अरब के बाद भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश है। इस पृष्ठभूमि में अमेरिका द्वारा ईरान पर प्रतिबंध लगाए जाने से तेल की कीमतों में वृद्धि की आशंका होगी जो भारत में उच्च मुद्रा स्फीति में प्रतिबिंबित हो सकती है। दूसरी ओर चाबहार बंदरगाह पर भारत और ईरान के समझौते के क्रियान्वयन पर भी दुष्प्रभाव पड़ने की आशंका है। इसके अतिरिक्त जैसा कि ऊपर कहा गया है कि नियम-आधारित विश्व व्यवस्था, भारत जिसका प्रमुख प्रवर्तक है, पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेंगे।

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