सिर्फ सात दिन में बवासीर (Piles) की छुट्टी, आजमाकर देख लीजिए

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बवासीर को piles और hemorrhoids के नाम से भी जानते है। इस रोग में गुदा के पास मस्से निकल आते है जिनमें खून निकलना, खारिश और तेज दर्द की शिकायत होती है। ज्यादा खून आने के कारण रोगी के शरीर में कमजोरी आने लगती है। वैसे तो दवा, घरेलू नुस्खे और आयुर्वेदिक उपचार से बवासीर के मस्से का इलाज किया जा सकता है पर अगर पाइल्स के लक्षण पता हो तो समय रहते ही इस रोग की पहचान कर के इसे बढ़ने से रोक सकते है।

बवासीर के प्रकार :-

बवासीर 2 तरह की होती है बाहर की बवासीर और अंदर की बवासीर। टॉयलेट करते वक़्त खून निकलता है तो इसे खुनी बवासीर भी कहते है।

अंदरूनी बवासीर (Internal Hemorrhoids) :-

-अंदर की बवासीर में मस्से गुदा के अंदर की तरफ होते है और टॉयलेट करते वक़्त इन मस्सों में तेज दर्द होने लगता है और खून भी आने लगता है।

-इस रोग की शुरुआत में गुदा के पास रक्त नलिका में सूजन आने लगती है और समस्या गंभीर होने पर सूजन बढ़ने लगती है जो बवासीर के मस्से का रूप ले लेती है और मल त्याग करते समय ये मस्से बहार आ जाते है और इनसे खून आने लगता है।

बाहरी बवासीर (External Hemorrhoids) :-

-बाहरी बवासीर में रोगी के गुदा द्वार के बाहर की तरफ मस्से हो जाते है जिनमें खुजली होती है। मस्सों को खुजलाने पर इनसे खून भी निकलने लगता है।

बवासीर के लक्षण :-

-बवासीर होने पर इसे लम्बे समय तक नजरअंदाज करना समस्या को बढ़ाना जैसा है। इससे बचने के लिए जरुरी है की समय रहते ही इसका इलाज शुरू किया जाये और समस्या गंभीर होने पर बिना संकोच किये डॉक्टर से मिलना चाहिए। आइये पहले हम पाइल्स के लक्षण के बारे में जाने, symptoms of piles in hindi.

-गुदा के आस पास अंदर या बहार की और मस्से या गांठे होना।

-मस्सों से निरंतर खून का बहना।

-टॉयलेट करते समय खून आना इसका एक बड़ा लक्षण है। समस्या कम हो तो खून बूंद बूंद निकलता है और कई बार खून की धार बन जाती है जिससे देख कर रोगी बहुत घबरा जाता है।

-रोगी जब मल त्यागते समय जोर लगाता है तब मस्से गुदा से बाहर निकल आते है। कई बार ये अपने आप ही अंदर चले जाते है तो कई बार इन्हें हाथ से अंदर की और धकेलना पड़ता है।

-बार बार टॉयलेट करने जाना पर मल त्यागने के वक़्त मल ना निकलना।

-गुदा द्वार पर खारिश और दर्द होना भी piles symptoms में से एक है।

बवासीर के कारण :-

पाइल्स होने का प्रमुख कारण कब्ज़ है। कब्ज़ की वजह से मल त्याग करते समय जोर लगाना पड़ता है जिससे गुदा के पास वाली रक्त नलिकाओं पर दबाव पड़ता है जिससे उनमें सूजन आने लगती है और ये बवासीर बन जाती है। जाने कब्ज़ का घरेलू इलाज कैसे करे।

-प्रेगनेंसी के दौरान भी कुछ महिलाओं को बवासीर की समस्या हो जाती है। गर्भावस्था में शरीर में हार्मोन में बदलाव आने और पेट में पल रहे बच्चे के दबाव के कारण गुदा के पास की नसों पर दबाव पड़ता है।

-उम्र बढ़ने की वजह से भी ये रोग हो जाता है। उम्र बढ़ने के साथ साथ गुदा का अंदरूनी भाग कमजोर होने लगता है जिससे बवासीर की शिकायत होने लगती है।

-ज्यादा वजन उठाते समय सांस रोक कर रखे से गुदा पर पड़ने लगता है जिससे बवासीर की शुरुआत होने लगती है।

-गैस, मल और मूत्र आने पे इसे अधिक समय तक रोकना नहीं चाहिए इससे भी piles हो सकती है।

-लम्बे समय तक बिना हिले डुले एक ही जगह बैठे रहने वाले लोगो को बवासीर जल्दी होती है।

-ज्यादा तला हुआ, मसालेदार और जंक फ़ूड खाने से पाचन तंत्र कमजोर होता है जिससे कब्ज़ की शिकायत होती है। अच्छा आहार ना लेना पाइल्स होने की अहम् वजह है।

-तंबाकू, धूम्रपान और शराब का सेवन करना भी पाइल्स होने का एक कारण है।

-मोटापा भी पाइल्स होने का एक कारण है। जिन लोगों का वजन ज्यादा होता है और पेट भर की और निकला होता है उन्हें पेट के बढ़ते हुए दबाव के कारण बवासीर होती है।

बवासीर का उपचार :-

यह नुस्खा एक महात्मा से प्राप्त हुआ और मरीजो पर प्रयोग करने पर 100 में से 90 मरीज लाभान्वित हुए यानि कि 90 प्रतिशत सफल है तो आइये जाने आप उस नुस्खे के बारे में।

औषिधि बनाने की विधि :-

अरीठे या रीठा के फल में से बीज निकाल कर शेष भाग को लोहे की कढाई में डालकर आंच पर तब तक चढ़ाए रखे जब तक वह कोयला न बन जाए जब वह जल कर कोयले की तरह हो जाए तब आंच पर से उतार कर सामान मात्रा में पपडिया कत्था मिलाकर कपडछन (सूती कपडे से छान कर) चूर्ण कर ले बस अब ये औषिधि तैयार है।

औषिधि सेवन करने का तरीका :-

इस तैयार औषिधि में से एक रत्ती (125मिलीग्राम ) लेकर मक्खन या मलाई के साथ सुबह-शाम लेते रहे, इस प्रकार सात दिन तक दवाई लेनी होती है।

इस औषिधि के मात्र सात दिन तक लेते रहने से ही कब्ज, बवासीर की खुजली, बवासीर से खून बहना आदि दूर होकर मरीज को राहत महसूस करने लगता है।

यदि मरीज इस रोग के लिए सदा के लिए छुटकारा पाना चाहे तो उन्हें हर छ: महीने के बाद फिर से 7 दिन का यह कोर्स बिलकुल इसी प्रकार दोहरा लेना चाहिए।

अरीठे या रीठा के अन्य भाषा में नाम :-

संस्कृत – अरिष्ट ,रक्तबीज,मागल्य

हिन्दी- रीठा,अरीठा ,

गुजराती- अरीठा

मराठी- रीठा

मारवाड़ी-अरीठो

पंजाबी- रेठा

कर्नाटक-कुकुटेकायि

औषिधि सेवन के दौरान परहेज़ :-

ध्यान रखे की औषिधि लेते समय सात दिन नमक का सेवन बिलकुल नहीं करना है ।

देशी इलाज में पथ्यापथ्य का विशेष ध्यान रखा जाता है कई रोगों में तो दवाई से ज्यादा तो पथ्य आहार जादा कारगर होता है।

औषिधि सेवन के दौरान क्या-क्या खाएं :-

मुंग या चने की दाल, कुल्थी की दाल, पुराने चावलों का भात, सांठी चावल, बथुआ, परवल, तोरई, करेला, कच्चा पपीता, गुड, दूध, घी, मक्खन, काला नमक, सरसों का तेल, पका बेल, सोंठ आदि पथ्य है। रोगी को दवा सेवन काल में इसका ही सेवन करना चाहिए।

औषिधि सेवन के दौरान क्या-क्या न खाएं :-

उड़द, धी, सेम, भारी तथा भुने पदार्थ, घिया, धूप या ताप, अपानुवायु को रोकना, साइकिल की सवारी, सहवास, कड़े आसन पर बैठना आदि ये सभी बवासीर के लिए हानिकारक है।