आदिशंकराचार्य ने चारों दिशाओं में स्थापित किए थे ये 4 मठ, जानिये और शेयर कीजिये

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प्राचीन भारतीय सनातन परम्परा के विकास और हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार में आदिशंकराचार्य का महान योगदान है। उन्होंने भारतीय सनातन परम्परा को पूरे देश में फैलाने के लिए भारत के चारों कोनों में चार शंकराचार्य मठों की स्थापना की थी। ये चारों मठ आज भी चार शंकराचार्यों के नेतृत्व में सनातन परम्परा का प्रचार व प्रसार कर रहे हैं।

आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रणेता, संस्कृत के विद्वान, उपनिषद व्याख्याता और सनातन धर्म सुधारक थे। धार्मिक मान्यता में इन्हें भगवान शंकर का अवतार भी माना गया। इन्होंने लगभग पूरे भारत की यात्रा की और इनके जीवन का अधिकांश भाग देश के उत्तरी हिस्से में बीता।

8 साल की उम्र में छोड़ दिया था घर :-

प्रचलित मान्यता के मुताबिक आदि शंकराचार्य को आदर्श संन्यासी के तौर पर जाना जाता है। उनका जन्म केरल के कालडी ग्राम’ में हुआ था। केवल 32 साल के जीवनकाल में उन्होंने कई उपलब्धियां अर्जित कीं। मात्र 8 साल की उम्र में वह मोक्ष की प्राप्ति के लिए घर छोड़कर गुरु की खोज में निकल पड़े थे।

भारत के दक्षिणी राज्य से नर्मदी नदी के किनार पहुंचने के लिए युवा शंकर ने 2000 किलोमीटर तक की यात्रा की। वहां गुरु गोविंदपद से शिक्षा ली और करीब 4 सालों तक अपने गुरु की सेवा की। इस दौरान शंकर ने वैदिक ग्रन्थों को आत्मसात कर लिया था।

शंकराचार्य केरल से कश्मीर, पुरी (ओडिशा) से द्वारका (गुजरात), श्रृंगेरी (कर्नाटक) से बद्रीनाथ (उत्तराखंड) और कांची (तमिलनाडु) से काशी (उत्तरप्रदेश) तक घूमे। हिमालय की तराई से नर्मदा-गंगा के तटों तक और पूर्व से लेकर पश्चिम के घाटों तक उन्होंने यात्राएं कीं। शंकराचार्य ने अपने दर्शन, काव्य और तीर्थयात्राओं से उसे एक सूत्र में पिरोने का का प्रयास किया।

सनातन धर्म के मूल स्वरूप को जीवित किया :-

आदि शंकराचार्य के समय में अंधविश्वास और तमाम तरह के कर्मकांडों का बोलबाला हो गया था। सनातन धर्म का मूल रूप पूरी तरह से नष्ट हो चुका था और यह कर्मकांड की आंधी में पूरी तरह से लुप्त हो चुका था। शंकराचार्य ने कई प्रसिद्ध विद्वानों को चुनौती दी। दूसरे धर्म और संप्रदाय के लोगों को भी शास्त्रार्थ करने के लिए आमंत्रित किया। शंकराचार्य ने बड़े-बड़े विद्वानों को अपने शास्त्रार्थ से पराजित कर दिया और उसके बाद सबने शंकराचार्य को अपना गुरु मान लिया।

शंकर के समय में असंख्य संप्रदाय अपने-अपने संकीर्ण दर्शन के साथ-साथ अस्तित्व में थे। लोगों के भ्रम को दूर करने के लिए शंकराचार्य ने 6 संप्रदाय वाली व्यवस्था की शुरूआत की जिसमें विष्णु, शिव, शक्ति, मुरुक और सूर्य प्रमुख देवता माने गए। उन्होंने देश के प्रमुख मंदिरों के लिए नए नियम भी बनाए।

हिंदू धर्म में मठों की परंपरा लाने का श्रेय आदि शंकराचार्य को जाता है। आदि शंकराचार्य ने देश की चारों दिशाओं में चार मठ की स्थापना की थी। आइए जानते हैं आदिशंकराचार्य द्वारा स्थापित इन मठों के बारे में…

श्रृंगेरी मठ :-

श्रृंगेरी शारदा पीठ भारत के दक्षिण में रामेश्वरम् में स्थित है। श्रृंगेरी मठ कर्नाटक के सबसे प्रसिद्ध मठों में से एक है। इसके अलावा कर्नाटक में रामचन्द्रपुर मठ भी प्रसिद्ध है। इसके तहत दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद सरस्वती, भारती, पुरी सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य ‘अहं ब्रह्मास्मि’ है, मठ के तहत ‘यजुर्वेद’ को रखा गया है। इसके पहले मठाधीश आचार्य सुरेश्वर थे।

गोवर्धन मठ :-

गोवर्धन मठ उड़ीसा के पुरी में है। गोवर्धन मठ का संबंध भगवान जगन्नाथ मंदिर से है। बिहार से लेकर राजमुंद्री तक और उड़ीसा से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक का भाग इस मठ के अंतर्गत आता है। गोवर्द्धन मठ के तहत दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘आरण्य’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य है ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ और इस मठ के तहत ‘ऋग्वेद’ को रखा गया है। इस मठ के पहले मठाधीश आदि शंकराचार्य के पहले शिष्य पद्मपाद हुए।

शारदा मठ :-

द्वारका मठ को शारदा मठ के नाम से भी जाना जाता है। यह मठ गुजरात में द्वारकाधाम में है। इसके तहत दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘तीर्थ’ और ‘आश्रम’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य है ‘तत्त्वमसि’ और इसमें ‘सामवेद’ को रखा गया है। शारदा मठ के पहले मठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) थे। हस्तामलक आदि शंकराचार्य के प्रमुख चार शिष्यों में से एक थे।

ज्योतिर्मठ :-

ज्योतिर्मठ उत्तराखण्ड के बद्रिकाश्रम में है। ऐतिहासिक तौर पर, ज्योतिर्मठ सदियों से वैदिक शिक्षा तथा ज्ञान का एक ऐसा केन्द्र रहा है जिसकी स्थापना 8वीं सदी में आदी शंकराचार्य ने की थी। ज्योतिर्मठ के तहत दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘गिरि’, ‘पर्वत’ और ‘सागर’ चारों दिशाओं में आदिशंकराचार्य ने स्थापित किए थे ये 4 मठसम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इसका महावाक्य ‘अयमात्मा ब्रह्म’ है। मठ के अंतर्गत अथर्ववेद को रखा गया है। इसके पहले मठाधीश आचार्य तोटक थे।

अधिक जानकारी के लिए देखे विडियो :-

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