एक छोटी सी कविता बचपन की यादों की,उन के लिए जिन्होंने पहली बार इंग्लिश कक्षा 6 में पढ़ी

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आज मैं आप सब के लिए एक छोटी सी कविता ले कर आया हूँ ,इस कविता को पढ़ते ही मुझे अपने बचपन वो सुनहरी यादें याद आ गई जिन्हें मैं कभी भूलना ही नहीं चाहता,और मैं सोचता हूँ आप सबकी भी कुछ ऐसी ही यादें होगीं जिन्हें आप भी याद जरुर करना चाहेगें और जिन्होंने 6th में पहली बार इंग्लिश दखी और पढ़ी है उन सबके लिए तो बहुत ही खास है

हम देहात के निकले बच्चे थे…!!

पांचवी तक घर से तख्ती लेकर स्कूल गए थे….!

स्लेट को जीभ से चाटकर अक्षर मिटाने की हमारी स्थाई आदत थी, कक्षा के तनाव में स्लेटी खाकर हमनें तनाव मिटाया था।

स्कूल में टाट पट्टी की अनुपलब्धता में घर से खाद या बोरी का कट्टा बैठने के लिए बगल में दबा कर भी ले जातें थे।

छः में पहली दफा हमनें अंग्रेजी का कायदा पढ़ा और पहली बार एबीसीडी देखी स्मॉल लेटर में  बढ़िया एफ बनाना हमें बारहवीं तक भी न आया था।

करसीव राइटिंग तो आजतक न सीख पाए।

हम देहात के बच्चों की अपनी एक अलहदा दुनिया थी,

कपड़े के बस्ते में किताब और कापियां लगाने का विन्यास हमारा अधिकतम रचनात्मक कौशल था।

तख्ती पोतने की तन्मयता हमारी एक किस्म की साधना ही थी। हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते (नई किताबें मिलती) तब उन पर जिल्द चढ़ाना हमारे जीवन का स्थाई उत्सव था।

सफ़ेद शर्ट और खाकी पेंट छोड़कर जब हम कालेज पहूँचे तो पहली दफा खुद के कुछ बड़े होने का अहसास हुआ।

आठ दस किलोमीटर दूर के कस्बें में साईकिल से रोज़ सुबह कतार बना कर चलना और साईकिल की रेस लगाना हमारे जीवन की अधिकतम प्रतिस्पर्धा थी।

हर तीसरे दिन पम्प को बड़ी युक्ति से दोनों टांगो के मध्य फंसाकर साईकिल में हवा भरतें मगर फिर भी खुद की पेंट को हम काली होने से बचा न पाते थे।

स्कूल में पिटते मुर्गा बनतें मगर हमारा ईगो हमें कभी परेशान न करता हम देहात के बच्चें शायद तब तक जानते नही थे कि ईगो होता क्या है। क्लास की पिटाई का रंज अगले घंटे तक काफूर हो गया होता, और हम अपनी पूरी खिलदण्डिता से हंसते पाए जाते।

रोज़ सुबह प्रार्थना के समय पीटी के दौरान एक हाथ फांसला लेना होता, मगर फिर भी धक्का मुक्की में अड़ते भिड़ते सावधान विश्राम करते रहते।

हम देहात के निकले बच्चें सपनें देखने का सलीका नही सीख पाते, अपनें माँ बाप को ये कभी नही बता पातें कि हम उन्हें कितना प्यार करते हैं।

हम देहात से निकले बच्चें गिरतें सम्भलतें लड़ते भिड़ते दुनिया का हिस्सा बनतें हैं। कुछ मंजिल पा जाते हैं, कुछ यूं ही खो जाते हैं।

एकलव्य होना हमारी नियति है शायद।

देहात से निकले बच्चों की दुनिया उतनी रंगीन नहीं होती वो ब्लैक एंड व्हाइट में रंग भरने की कोशिश जरूर करतें हैं।

पढ़ाई फिर नौकरी के सिलसिलें में लाख शहर में रहें लेकिन हम देहात के बच्चों के अपने देहाती संकोच जीवनपर्यन्त हमारा पीछा करते हैं, नही छोड़ पाते हैं

सुड़क सुड़क की ध्वनि के साथ चाय पीना

अनजान जगह जाकर रास्ता कई कई दफा पूछना।

कपड़ो को सिलवट से बचाए रखना और रिश्तों को अनौपचारिकता से बचाए रखना हमें नहीं आता है।

अपने अपने हिस्से का निर्वासन झेलते हम बुनते है कुछ आधे अधूरे से ख़्वाब और फिर जिद की हद तक उन्हें पूरा करने का जुटा लाते है आत्मविश्वास।

कितने भी बड़े क्यूँ ना हो जायें हम आज भी दोहरा चरित्र नही जी पाते हैं, जैसे बाहर दिखते हैं, वैसे हीं अन्दर से होते हैं।

हम देहात से निकलें बच्चें थोड़े अलग नहीं पूरे अलग होते हैं अपनी आसपास की दुनिया में जीते हुए भी,

खुद को हमेशा पाते हैं,

थोड़ा प्रासंगिक,

थोड़ा अप्रासंगिक ……..

आज मैं आपके लिए ये कविता इसलिए भी लेकर आया,क्योंकि अच्छे समय को याद करना और मुस्कुराना सबसे अच्छी हेल्थ टिप्स है ….

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