3 दिन में पथरी को 1 दिन में गांठ को गला देती है ये सब्जी, गठिया और कैंसर के लिए भी किसी वरदान से कम नही

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तोरई एक प्रकार की सब्जी होती है और इसकी खेती भारत में सभी स्थानों पर की जाती है। आयुर्वेद में तोरई को ठंडा बताया गया है। गर्मी के मौसम में खाने से शरीर के अंदर ठंडक पहुँचता है। तोरई में विटामिन, फाइबर, प्रोटीन और मिनरल्स भरपूर मात्रा में होता है। तोरई को गुजरात में “घिसोड़ा” और मराठी में “दोडकी” और शिरोल में “कोशातकी” कहते है। साथ ही साथ विदेशो में तोरई को स्पंजगार्ड, रिजगार्ड, एंगल लूफा आदि नामो से पुकाते है। यह अपनी कड़ी धारियों से पहचानी जाती है। तोरई जब छोटी, कच्ची और हरी होती है तब ही सब्जी बनाने के काम आती है। तोरई जब ४ इंच का होता है उसकी सब्जी बनाई जाती है उसे सतपुतिया(छोटी तरोई या नेनुआ) कहते है। तोरई में प्राकृतिक रूप से बना हुआ लूफा स्पंज निकलता है। तोरई रगड़ने से डेड स्किन निकल जाती है। तोरई को स्पंज की तरह स्किन पर यूज़ किया जा सकता है। तोरई पित्त और कफ दोष को दूर करती है। तोरई खाना हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही फायदेमंद होता सिद्ध हुआ है।

गुण (Property) – इसकी प्रकृति ठंडी और तर होती है।

विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases)

पथरी : तोरई की बेल गाय के दूध या ठंडे पानी में घिसकर रोज सुबह के समय में 3 दिन तक पीने से पथरी गलकर खत्म होने लगती है।

फोड़े की गांठ : तोरई की जड़ को ठंडे पानी में घिसकर फोड़ें की गांठ पर लगाने से 1 दिन में फोड़ें की गांठ खत्म होने लगता है।

चकत्ते : तोरई की बेल गाय के मक्खन में घिसकर 2 से 3 बार चकत्ते पर लगाने से लाभ मिलता है और चकत्ते ठीक होने लगते हैं।

बवासीर : तोरई सब्जी खाने से कब्ज की समस्या दूर होने लगती है जिसके फलस्वरूप बवासीर ठीक होने लगती है।

पेशाब की जलन : तोरई पेशाब की जलन और पेशाब की बीमारी को दूर करने में लाभकारी होती है।

आंखों के रोहे तथा फूले : आंखों में रोहे (पोथकी) हो जाने पर तोरई (झिगनी) के ताजे पत्तों का रस को निकालकर रोजाना 2 से 3 बूंद दिन में 3 से 4 बार आंखों में डालने से लाभ मिलता है।

कैंसर को ख़त्म करता है : तोरई में उपस्थित विटामिन सी, फोलेट और बीटा-कैरोटीन आदि कोशिकाओं को हानि न पहुंच पाये इसमें मदद करता है। तोरई में बीटा- करोटीन होने से साथ ही साथ रोज़ाना खाने से कैंसर न होने की संभावना ९०% ख़त्म हो जाते है। तोरई को खाने से समग्र स्वास्थ्य में सुधार लाता है। तोरई और मूली की सब्जी खाने से मुँह का कैंसर नहीं होता है।

गर्भावस्था में फायदेमंद : तोरई के अंदर विटामिन बी-कॉम्प्लेक्स सर्वाधिक मात्रा में पाया जाता है। इसलिए ड्रॉक्टर गर्भावस्था के समय तोरई खाने की सलाह देता है। तोरई के अंदर फोलिक एसिड की उपस्थिति से बच्चे की रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है। तोरई शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं के उत्पादन में मदद करता है। तोरई खाने से मानव की मनोदशा और ऊर्जा स्तर को बनाए रखने में सहायता करता है। गर्भवती महिला हफ्ते में ३ बार तोरई खाये डिलेवरी के समय किसी भी प्रकार की समस्या पैदा नहीं होती है।

बालों को काला करना : तुरई के टुकड़ों को छाया में सुखाकर कूट लें। इसके बाद इसे नारियल के तेल में मिलाकर 4 दिन तक रखे और फिर इसे उबालें और छानकर बोतल में भर लें। इस तेल को बालों पर लगाने और इससे सिर की मालिश करने से बाल काले हो जाते हैं।

बवासीर (अर्श) : तोरई की सब्जी खाने से कब्ज ठीक होती है और बवासीर में आराम मिलता है। करवी तोरई को उबाल कर उसके पानी में बैंगन को पका लें। बैंगन को घी में भूनकर गुड़ के साथ भर पेट खाने से दर्द तथा पीड़ा युक्त मस्से झड़ जाते हैं।

योनिकंद (योनिरोग) : कड़वी तोरई के रस में दही का खट्टा पानी मिलाकर पीने से योनिकंद के रोग में लाभ मिलता हैं।

गठिया (घुटनों के दर्द में) रोग: पालक, मेथी, तोरई, टिण्डा, परवल आदि सब्जियों का सेवन करने से घुटने का दर्द दूर होता है।

पीलिया : कड़वी तोरई का रस दो-तीन बूंद नाक में डालने से नाक द्वारा पीले रंग का पानी झड़ने लगेगा और एक ही दिन में पीलिया नष्ट हो जाएगा।

कुष्ठ (कोढ़) : तोरई के पत्तों को पीसकर लेप बना लें। इस लेप को कुष्ठ पर लगाने से लाभ मिलने लगता है। तोरई के बीजों को पीसकर कुष्ठ पर लगाने से यह रोग ठीक हो जाता है।

गले के रोग : कड़वी तोरई को तम्बाकू की तरह चिल्म में भरकर उसका धुंआ गले में लेने से गले की सूजन दूर होती है।

उल्टी कराने के लिए : तोरई (झिमनी) के बीजों को पीसकर रोगी को देने से उल्टी और दस्त होने लगते हैं।

हानिकारक प्रभाव (Harmful effects) – तोरई कफ तथा वात उत्पन्न करने वाली होती है अत: जरूरत से अधिक इसका सेवन करना हानिकारक हो सकता है। तोरई पचने में भारी और आमकारक है। वर्षा ऋतु में तोरई का साग रोगी व्यक्तियों के लिए लाभदायक नहीं होता है।

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