जानिए इस लाजवाब औषधि पुनर्नवा को, ये बहुत से रोगों में रामबाण इलाज है

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यह एक औषधीय पौधा है जो की आयुर्वेदिक ग्रंथों में पुनर्नवा (Punarnava) के नाम वर्णित है जिसका शाब्दिक अर्थ है पुनरुत्थान और इसी चीज़ के लिए इस पौधे का उपयोग किया जाता है। इसमें  उच्च पौष्टिक मूल्य होने के कारण इसके कई स्वास्थ्य लाभ हैं। इसमें विटामिन सी, आयरन, प्रोटीन, कैल्शियम और सोडियम जैसे तत्व पाए जाते हैं|

ये हिन्दी में साटी, सांठ, गदहपुरना, विषखपरा, गुजराती में साटोड़ी, मराठी में घेटुली तथा अंग्रेजी में ‘हॉगवीड’ नाम से जानी जाती है। पुनर्नवा स्वाद में कड़वा, तीखा, कसैला और खारा होता है। लेकिन इस पौधे में की औषधीय गुण विद्यमान हैं। इसका प्रयोग कई बिमारियों के इलाज के लिए किया जाता है।

पहचान

पुनर्नवा लेटी हुई छत्ताकार बेलनुमा होती है; यह बरसात के मौसम में पैदा होकर बढ़ती है और हेमन्त ऋतु में सूख जाती है। इसके दो प्रकार हैं श्वेत व लाल। श्वेत के पत्ते तथा डंठल सफेदी लिये लाल होते हैं। रक्त (लाल) के हल्के लाल होते हैं। लाल पुनर्नवा के पत्ते श्वेत की अपेक्षा चक्राकार न होकर कुछ लंबे होते हैं। इसके पत्ते कोमल, मांसल, गोल या अंडाकार और निचला तला सफेद होता है। इसमें पुष्प (फूल) सफेद या गुलाबी छोटे-छोटे, छतरीनुमा लगते हैं। फल आधा इंच के छोटे, चिपचिपे बीजों से युक्त तथा पांच धारियों वाले होते हैं। इसकी जड़ 1 फुट तक लंबी, उंगली जितनी मोटी, गूदेदार, 2 से 3 शाखाओं से युक्त, तेजगंध वाली तथा स्वाद में तीखी होती है। औषधि प्रयोग के लिए इसकी जड़ और पत्ते काम में आते हैं।

औषधीय घटक और गुण :

इस औषधि का मुख्य औषधीय घटक एक प्रकार का एल्केलायड है, जिसे पुनर्नवा कहा गया है। इसकी मात्रा जड़ में लगभग 0.04 प्रतिशत होती है। अन्य एल्केलायड्स की मात्रा लगभग 6.5 प्रतिशत होती है। पुनर्नवा के जल में न घुल पाने वाले भाग में स्टेरॉन पाए गए हैं, जिनमें बीटा-साइटोस्टीराल और एल्फा-टू साईटोस्टीराल प्रमुख है। इसके निष्कर्ष में एक ओषजन युक्त पदार्थ ऐसेण्टाइन भी मिला है। इसके अतिरिक्त कुछ महत्त्वपूर्ण् कार्बनिक अम्ल तथा लवण भी पाए जाते हैं। अम्लों में स्टायरिक तथा पामिटिक अम्ल एवं लवणों में पोटेशियम नाइट्रेट, सोडियम सल्फेट एवं क्लोराइड प्रमुख हैं। इन्हीं के कारण सूक्ष्म स्तर पर कार्य करने की सामर्थ्य बढ़ती है।

पुनर्नवा अनेक रोगों के लिए एक बेहद उपयोगी औषधि है :

जवानी बनाए रखता है:-

आयुर्वेद के अनुसार इस पौधे में व्यक्ति को पुनः नवा अर्थात जवान कर देने की क्षमता है और मजे की बात यह भी है कि मध्यप्रदेश के पातालकोट के आदिवासी इसे जवानी बढ़ाने वाली दवा के रूप में उपयोग में लाते हैं।
पुनर्नवा की ताजी जड़ों का रस (2 चम्मच) दो से तीन माह तक लगातार दूध के साथ सेवन करने से वृद्ध व्यक्ति भी युवा की तरह महसूस करता है।

पीलिया दूर करता है

पीलिया रोग में आंखें हल्दी के समान पीली दिखाई देती हैं। त्वचा का रंग पीला होना, मूत्र में पीलापन, ज्वर, कमजोरी आदि लक्षण दिखाई देते हैं।

आदिवासी पुनर्नवा का उपयोग विभिन्न विकारों में भी करते हैं। इसके पत्तों का रस अपचन में लाभकारी होता है। पीलिया होने पर पुनर्नवा के संपूर्ण पौधे के रस में हरड़ या हर्रा के फलों का चूर्ण मिलाकर लेने से रोग में आराम मिलता है।

हेपेटाइटिस में है गजब की दवा

लीवर में सूजन को मेडिकल साइंस ने हेपेटाइटिस का नाम दिया है। हमारे देश में हेपेटाइटिस के ए. बी. सी.और ई. वायरस पाए जाते हैं। यह रोग विषाणुओं के द्वारा हमारे शरीर में फैलता है। विषाणुओं से फैलने के कारण इसे वायरल हेपेटाइटिस कहा जाता है।

लीवर (यकृत) में सूजन आ जाने पर पुनर्नवा की जड़ (3ग्राम) और सहजन अथवा मुनगा की छाल (4 ग्राम) लेकर पानी में उबाला जाए व रोगी को दिया जाए तो अतिशीघ्र आराम मिलता है।

प्रोस्टेट की समस्या खत्म करता है

प्रोस्टेट एक छोटी-सी ग्रंथि होती है, जिसका आकार अखरोट के समान होता है। यह पुरुषों में मूत्राशय के नीचे तथा मूत्रनली (शरीर में वह नलिका जिसके माध्यम से मूत्र बाहर निकलता है) के आसपास स्थित होता है।

पुरुष प्रजनन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। 50 वर्ष की आयु के उपरांत प्रोस्टेट संबंधी समस्याएं आम बात होती हैं। प्रोस्टेट ग्रंथियों के वृद्धि होने पर पुनर्नवा की जड़ों के चूर्ण का सेवन लाभकारी होता है।

मोटापा कम हो जाता है

मोटापा घटाने के लिए भोजन शैली में सुधार जरूरी है। कुछ प्राकृतिक चीजें ऐसी हैं, जिनके सेवन से वजन नियंत्रित रहता है।

मोटापा कम करने के लिए पुनर्नवा के पौधों को एकत्र कर सुखा लिया जाए और चूर्ण तैयार किया जाए। 2 चम्मच चूर्ण शहद में मिलाकर सुबह-शाम सेवन किया जाए तो शरीर की स्थूलता तथा चर्बी कम हो जाती है।

दिल से संबंधित रोगों में रामबाण

अगर आप दिल से संबंधित किसी रोग से पीड़ित हैं या हमेशा दिल की बीमारियों से बचे रहना चाहते हैं तो पुनर्नवा का पांचांग (समस्त पौधा) का रस और अर्जुन छाल की समान मात्रा बड़ी फाय़देमंद होती है।
पुनर्नवा की जड़ों को दूध में उबालकर पिलाने से बुखार में तुरंत आराम मिलता है। इसी मिश्रण के सेवन से अल्पमूत्रता और मूत्र में जलन की शिकायत से छुटकारा मिलता है।

अगर शरीर के बाहरी हिस्‍से में सूजन हो तो पुनर्नवा के पत्‍तों को पीसकर गरम करके बांधिए, सूजन कम हो जाएगी। अगर इसकी पत्‍ती बांधने से सूजन ठीक न हो तो पुनर्नवा को कुटकी, सौठ और चिरायता के साथ मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से तुरन्त लाभ होता है।

दमा के मरीजों :-

यह बहुत फायदेमंद है। दमा के मरीज चंदन के साथ मिलाकर इसका सेवन करें। इससे कफ आना बंद होता है और दमे से श्‍वांस की नली में हुई सूजन भी समाप्‍त होती है।

गोनोरिया

होने पुनर्नवा का प्रयोग करना चाहिए। इससे पेशाब की मात्रा बढ़ जाती है और गोनोरिया के घाव पेशाब के रास्‍ते बाहर निकल जाते हैं। गोनोरिया के रोगी को पुनर्नवा की जड़ पीसकर देना चाहिए।

किडनी

पर इसका प्रभाव पड़ता है और किडनी संबंधित बीमारियों के होने की संभावना कम होती है। हर रोज पुनर्नवा का रस 1 से 4 ग्राम देने पर गुर्दे के संक्रमण होने की कम संभावना होती है। इसमें पाया जाने वाला पोटैशियम नाइट्रेट और अन्‍य पोटैशियम के यौगिक विद्यमान होते हैं।

जोड़ो में हो रहे दर्द को दूर

करने के लिए इसका प्रयोग करना चाहिए। यह गठिया के मरीजों के लिए फायदेमंद है। गठिया के रोगी इसके पत्‍तों को पीसकर लें, उसे गरम करके जोड़ों पर लगाने से फायदा होता है।

विषनाशक

पुनर्नवा के पत्‍ते विषनाशक होते हैं। सांप के काटने पर पुनर्नवा के पत्‍तों को पीसकर उसका रस निकाल सांप के कटे वाली जगह पर लगाने से विष का प्रभाव कम हो जाता है। यह बिच्‍छू का विष भी कम करता है। बिच्‍छू का डंक लगने पर इसकी जड़ को पानी में घिसकर लगाने से फायदा होता है।

आँखों में लाभदायक

इसकी जड पीस कर घी में मिलाकर आँख में लगाने से फली तथा शहद में मिलाकर लगाने से आँखों की लालिमा मिटाने में लाभ होता है। भाँगरे के रस में मिलाकर लगाने से आँखों की खुजली तक मिट जाती है। जिन्हें रतौंधी हो वे इसकी जड और पीपल के साथ गाय के गोबर का रस मिलाकर उबालकर आँखों में लगाते है तो बडा लाभ मिलता है। जड लेकर उसे जल के साथ घिसकर आँखों में लगाने से जिनकी दृष्टि कमजोर हो गई हो उन्हें अत्यध्कि लाभ मिलता है

पुनर्नवा का खुराक

इसकी सामन्य खुराक दिन में दो बार 2 से 5 चम्मच होती है और इसे पानी के साथ ही लेना  चाहिए।

इतनी खुराक केवल एक सामान्य औसत खुराक है लेकिन नियमित रूप से इसका उपयोग करने से आयुर्वेदिक विशेषज्ञ या चिकित्सक से जरूर परामर्श करना चाहिए|

पुनर्नवा के दुष्प्रभाव

यदि इसे पानी के बिना या खाली पेट लिया जाए तो यह गले में जलन का कारण बन सकता है।

12 साल से कम उम्र के बच्चों और गर्भवती महिलाओं को इसका उपयोग नहीं करना चाहिए। पुनर्नवा में उच्च मात्रा में आयरन होने से यह पेट खराब होने का कारण बन सकता है।

अगर आपको इससे कोई फायदा लगे तो इसे शेयर करके औरों को भी बताएं. साथ ही ध्यान रखें कि सभी घरेलु नुस्खे सभी के लिए बराबर कारगर नहीं होते. अपनी तासीर के हिसाब से इनका इस्तेमाल करें. कोई भी दिक्कत हो तो तुरंत वैद्य या चिकित्सक से संपर्क करें.

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