जानिये ! साधारण से दिखने वाले अमलतास पेड़ के आयुर्वेदिक लाभ

955

अमलतास का पेड़ काफी बड़ा होता है, जिसकी ऊंचाई 25-30 फुट तक होती है। इसके पेड़ की छाल मटमैली और कुछ लालिमा लिए होती है। अमलतास का पेड़ आमतौर पर सभी जगह पाया जाता है। इसे बाग-बगीचों और घरों में सजावट के लिए भी लगाया जाता है। यह मैदानी भागों और देहरादून के जंगलों में अधिकता से मिलता है। अमलतास के पत्ते लगभग एक फुट लंबे, चिकने और जामुन के पत्तों के समान होते हैं। मार्च-अप्रैल में इसकी पत्तियां झड़ जाती हैं। फूल डेढ़ से ढाई इंच व्यास के चमकीले तथा पीले रंग के होते हैं। फूलों से आच्छादित पेड़ की शोभा देखते ही बनती है। इसके फूलों में कोई गंध नहीं होती है। अमलतास के फूल की फलियां एक से दो फुट लंबी और बेलनाकार होती हैं। कच्ची फलियां हरी और पकने पर काले रंग की सुबह पूरे वर्ष वृक्ष पर लटकती मिलती हैं। फली में 25 से 100 तक चपटे एवं हल्के पीले रंग के बीज होते हैं। इनके बीच में काला गूदा होता है, जो दवाई के काम में आता है। इसकी छाल चमड़ा रंगने और सड़ाकर रेशे को निकालकर रस्सी बनाने में प्रयुक्त होती है।

विभिन्न भाषाओं में नाम :

हिंदी                       अमलतास, धनबहेड़ा।

मराठी                    बाहवा।

गुजराती                 गरमालों।

बंगाली                    सोंदाल, सोनालु।

तेलगू                     रेलचट्टू

असमी                    सोनास

अंग्रेजी                    पुडिंग पाइप ट्री

Image result for अमलतास का पेड़

गुण :  अमलतास मधुर, प्रकृति में शीतल, भारी, स्वादिष्ट, स्निग्ध (चिकना), कफनाशक और पेट साफ करने वाला है। साथ ही यह ज्वर (बुखार), दाह (जलन), हृदय रोग, रक्तपित्त, वातरोग, दर्द, गैस, प्रमेह (वीर्य विकार) एवं मूत्ररोग नाशक है। यह गठिया रोग, गले की तकलीफ, आंतों का दर्द, रक्त की गर्मी और नेत्र रोगों में उपयोगी होता है।

रासायनिक संरचना :  अमलतास के पत्तों और फूलों में ग्लाइकोसाइड, तने की छाल में 10 से 20 प्रतिशत टैनिन, जड़ की छाल में टैनिन के अलावा ऐन्थ्राक्विनीन, फ्लोवेफिन तथा फल के गूदे में शर्करा 60 प्रतिशत, पेक्टीन, ग्लूटीन, क्षार, भस्म और पानी होता है।

विभिन्न रोगों में सहायक :

गले के रोग : अमलतास की जड़ की छाल 10 ग्राम की मात्रा में लेकर उसे 200 मिलीलीटर पानी में डालकर उबालें और पकाएं। पानी एक चौथाई बचा रहने पर छान लें। इसमें से 1-1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन करने से गले की सूजन, दर्द, टांसिल में शीघ्र आराम मिलता है।

अमलतास की छाल (पेड़ की छाल) के काढ़े से गरारा करने पर गले की प्रदाह (जलन), ग्रंथिशोध (गले की नली में सूजन) आदि रोग ठीक हो जाते हैं।

बिच्छू का विष : अमलतास के बीजों को पानी में घिसकर बिच्छू के दंश वाले स्थान पर लगाने से कष्ट दूर होता है।

Related image

त्वचा से सम्बंधित रोग : अमलतास के पत्तों को सिरके में पीसकर बनाए लेप को चर्म रोगों यानी दाद, खाज-खुजली, फोड़े-फुंसी पर लगाने से रोग दूर होता है। यह प्रयोग कम से कम तीन हफ्ते तक अवश्य करें। अमलतास के पंचांग (पत्ते, छाल, फूल, बीज और जड़) को समान मात्रा में लेकर पानी के साथ पीसकर लेप बना लें। इस लेप को लगाने से त्वचा सम्बंधी उपरोक्त रोगों में लाभ मिलता है।

कुष्ठ (कोढ़) : अमलतास के पत्तों को पीसकर बना लेप अथवा अमलतास के अंकुरों के रस का लेप कुष्ठ, दाद, खाज-खुजली और विचर्चिका (खुजली) के चकत्तों पर लगाने से लाभ होगा।

अमलतास के पत्तों को सिरके के साथ पीसकर कुष्ठ के जख्मों पर लगाने से आराम आता है।

अमलतास की 15-20 पत्तियों से बना लेप कुष्ठ का नाश करता है। अमलतास की जड़ का लेप कुष्ठ रोग के कारण हुई विकृत त्वचा को हटाकर जख्म वाले स्थान को ठीक कर देता है।

बवासीर : 10 ग्राम अमलतास की फलियों का गूदा, 6 ग्राम हरड़ और 10 ग्राम मुनक्का (काली द्राक्ष) को पीसकर 500 मिलीलीटर पानी में पकायें। जब यह आठवां हिस्सा शेष बचे तो उतारकर रख दें। इस काढ़े को प्रतिदिन सुबह के समय देना चाहिए। 4 दिन में ही असर दिखाई देता है। रक्त-पित्त यानी नस्कोरे फूटकर खून बहने, पेशाब साफ न होने और बुखार में भी यह काढ़ा दिया जाता है। इससे दस्त साफ होकर भूख भी लगती है।

अमलतास का काढ़ा बनाकर उसमें सेंधानमक और घी मिलाकर उस काढ़ा को पीने से खून का बहना बंद होता है तथा रोग ठीक होता है।

अमलतास का गूदा 40 ग्राम 400 मिलीलीटर  पानी के साथ मिट्टी के बर्तन में पकायें। पानी का रंग लाल होने पर उसे उतारकर छान लें और उसके पानी में सेंधानमक 6 ग्राम तथा गाय का घी 20 ग्राम मिलाकर ठण्डा करके पीयें। इसे पीने से 3 से 4 दिन में ही खूनी बवासीर में खून का गिरना बंद हो जाता है।

Image result for अमलतास का पेड़

शरीर में सूजन : लगभग 20 ग्राम की मात्रा में अमलतास के ताजे फूल और 3 ग्राम की मात्रा में भुना हुआ सुहागा लेकर उसको हल्के गर्म पानी के साथ सुबह और शाम को देने से यकृत और प्लीहा वृद्धि के कारण पैदा होने वाली सूजन दूर हो जाती है।

विसर्प (छोटी-छोटी फुंसियों का दल बनना) : अमलतास के पत्तों को पीसकर घी में मिलाकर लेप करने से विसर्प में लाभ होता है।

किक्किस रोग, सद्योव्रण में अमलतास के पत्तों को स्त्री के दूध या गाय के दूध में पीसकर लगाना चाहिए।

अंडवृद्धि : अमलतास की फली के 1 चम्मच गूदे को 1 कप पानी में उबालकर आधा शेष रहने पर उसमें 1 चम्मच घी मिलाकर खड़े-खड़े पीने से अंडवृद्धि में लाभ होता है।

20 ग्राम अमलतास के गूदे को 100 मिलीलीटर पानी में उबाल लें, 50 मिलीलीटर पानी शेष रह जाने पर 25 ग्राम घी में मिलाकर पीने से अंडकोष की सूजन कम हो जाती है।

लकवा (पक्षाघात-फालिस फेसियल, परालिसिस) होने पर : लगभग 10 ग्राम से 20 ग्राम अमलतास के पत्तों का रस पीने तथा चेहरे पर अच्छी तरह से नियमित रूप से मालिश करने से मुंह के लकवे में लाभ मिलता है।

कामला (पीलिया) होने पर : अमलतास का गूदा, पीपलामूल, नागरमोथा, कुटकी तथा जंगी हरड़। सबको 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर एक कप पानी में उबालें। काढ़ा जब आधा कप बचा रह जाए, तो इसका सेवन करें। लगातार 15 दिनों तक इसका सेवन करने से पीलिया के रोग में लाभ होगा।

Image result for अमलतास पेड़ के आयुर्वेदिक लाभ

कान का बहना : 100 ग्राम अमलतास के पत्तों को पानी में उबालकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े से कान को अंदर तक धोने से कान में से मवाद बहना ठीक हो जाता है।

अमलतास का काढ़ा बनाकर कान में डालने से कान में से मवाद बहना ठीक हो जाता है।

गठिया रोग : अमलतास के पत्ते को सरसों के तेल में तलकर रखें। इन्हें भोजन के साथ खाने से घुटने का हल्का दर्द दूर होता है।

चालविभ्रम (लंगड़ाकर चलना) : लुढ़ककर चलने वाले रोगी को अमलतास के पत्तों का रस 100 से 200 मिलीलीटर सुबह-शाम सेवन कराने से रोग दूर होता है। इसके रस से पैरों की अच्छी तरह से मालिश भी करें। इससे रोगी का रोग ठीक होता है।

नोट :-  अमलतास को औषधि के रूप में प्रयोग करने से पेट में दर्द तथा मरोड़ पैदा होती है, अत: इसके प्रयोग में सावधानी रखनी चाहिए।

अगर आपको ये पोस्ट अच्छी लगी तो जन-जागरण के लिए इसे अपने Facebook पर शेयर करें

ऐसी ही और बातों के लिए like करें हमारे पेज Such Khu को।

और ऐसे ही अन्य स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी के लिए निचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें और गुरूप ज्वाइन करें।

जुडें हमारे फेसबुक ग्रुप से क्लिक करें आयुर्वेदिक देशी नुस्खे।